अभिजीत मिश्र

Welcome to Suvichar Sangrah सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है :- प्रदीप कुमार पाण्डेय. This is the Only Official Website of सुविचार संग्रह     “Always Type www.suvicharsangrah.com . For advertising in this website contact us suvicharsangrah80@gmail.com.”
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Sunday, November 10, 2024

सर्व प्रथम अपनी सेवा और सहायता

November 10, 2024 0 Comments










🔹 इसमें कोई सन्देह नहीं की इस जगत में अनेक प्रकार के पुण्य और परमार्थ हैं। हमारे शास्त्रों में अनेक प्रकार के धर्मिक अनुष्ठानों का सविस्तार विधि विधान है और उनके सुविस्तृत महात्म्यों का वर्णन है। दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य कार्य है, इससे कीर्ति आत्म संतोष तथा सद्गति की प्राप्ति होती है। परन्रतु इन सबसे बढ़ कर भी एक पुण्य परमार्थ है और वह है-आत्म निर्माण। अपने दुर्गुणों को, कुविचारों को, कुसंस्कारों को, ईर्ष्या, तृष्णा, क्रोध, डाह, क्षोभ, चिन्ता, भय एवं वासनाओं को विवेक की सहायता से आत्मज्ञान की अग्नि में जला देना। यह इतना बड़ा यज्ञ है जिसकी तुलना सशस्त्र अश्वमेधों से नहीं हो सकती। अपने अज्ञान को दूर करके मन मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भी भगवान की सच्ची पूजा है। अपनी मानसिक तुच्छता, दीनता, हीनता, दासता, को हटाकर निर्भयता, सत्यता, पवित्रता एवं प्रसन्नता की आत्मिक प्रवृत्तियाँ बढ़ाना करोड़ मन सोना दान करने की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है।

हर मनुष्य अपना-अपना आत्म निर्माण करे तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है। फिर मनुष्यों को स्वर्ग जाने की इच्छा करने की नहीं, वरन् देवताओं के पृथ्वी पर आने की आवश्यकता अनुभव होने लगेगी । दूसरों की सेवा सहायता करना पुण्य है, पर अपनी सेवा सहायता करना इससे भी बड़ा पुण्य है। अपनी शारीरिक मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक स्थिति को ऊँचा उठाना, अपने को एक आदर्श नागरिक बनाना इतना बड़ा धर्म कार्य है जिसकी तुलना अन्य किसी भी पुण्य परमार्थ से नहीं हो सकती।

Tuesday, December 19, 2023

वास्तविक गुरु कौन.....?

December 19, 2023 0 Comments


 










वास्तविक_गुरू_कौन_?

विचार_करें ।

#बिना_पढ़े_पसंद_या_टिप्पणी_ना_करें 


"गुरू जी" एक बहुत ही सम्मानित शब्द है।

जिसके सम्मान में हमारा मस्तक स्वतः श्रद्धा से झुक जाए। जो अज्ञानरूपी अन्धकार को मिटा दे, उसका नाम "गुरू" है।

लेकिन, मुझे लगता है कि शायद हम लोगों ने आजकल गुरू की परिभाषा ही बदल दी है।

जहाँ तक मैं समझता हूँ कि आज के समय में हम लोग अपने असली गुरू को भूलकर सिर्फ और सिर्फ नकली गुरूओ के मोहजाल मे फंसते जा रहे हैं जो टेलिविजन आदि के माध्यम से अपना माया जाल फैलाकर हमे दिगभ्रमित कर देते हैं।

वास्तविक एवं पहले गुरू हमारे माता- पिता होते हैं।

दुसरे गुरू हमारा परिवार व परिवेश

तीसरे गुरू हमारे शिक्षक 

और चौथे गुरू हमारे परमपिता परमात्मा होते हैं।

इनके अलावा मुझे और किसी गुरू के बारे मे पता नहीं है।

( ये मेरे स्वयं के विचार है।)


अब शास्त्रो के कथन पर विचार करें गुरू के विषय में :-

गुरू को चाहिए कि वह शिष्य को पुत्र की तरह मानता हुआ, उसकी उन्नति की इच्छा करता हुआ, धर्मो के रहस्य गुप्त न रखते हुए उसे विद्या प्रदान करे।

 अकेले गुरू से ही यथेष्ट और सुदृढ़ बोध नहीं होता । उसके लिए अपनी बुद्धि से भी बहुत कुछ सोचने समझने की आवश्यकता है।

" यदि हम स्वयं विचार कर निर्णय नही करेंगे, तो ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को कैसे जान सकेंगे? 

कहीं कहीं शास्त्रो में स्वंय के "विवेक" को ही जन्मजात गुरू कहा गया है।


अर्थात हम गुरू से शिक्षा तो हासिल कर सकते है,परन्तु ब्रह्म के स्वरूप को जानने के लिए अपनी ही बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा ।

यदि हम भगवान राम, कृष्ण, हनुमान, सुदामा, पाण्डव के जीवनी पर नजर डाले तो यहाँ भी यही बात सामने आती है कि, उन्होने भी सिर्फ अध्ययन करने के लिए ही अपने अपने गुरूओं की शरण ली थी।


मित्रों, मेरा उदेश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नही है। 

मैं यह भी नही कहता हुँ कि मेरा यह पोस्ट १००% सही है, शायद मै गलत भी हो सकता हुँ।


मित्रों, आज कुछ गलत लोगो ने हमारे देश की संस्कृति को नाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। जिस कारण अत्यन्त दुःख होता है।

सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर अपना समय देने/लेख पढने के लिए दिल से आभार।

Monday, May 30, 2022

प्रेम

May 30, 2022 0 Comments












प्रेम को शायद परिभाषित तो नहीं किया जा सकता, यह भी कहा जा सकता है कि प्रेम को परिभाषित करने की योग्यता लेखक (प्रदीप कुमार पाण्डेय) में नहीं है परन्तु सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर इस लेख के माध्यम से प्रेम को समझने का प्रयास लेखक द्वारा किया गया है।

    प्रेम मात्र दो अक्षर का अत्यंत छोटा शब्द है लेकिन जितना छोटा है यह उतनी ही गहराई अपने अन्दर समाहित किया है । प्रेम एक अद्भुत और अलौकिक शक्ति है । प्रेम के अभाव में अच्छी से अच्छी सामग्री भी मनुष्य को जरा सा भी प्रसन्नता प्रदान नहीं कर सकती । प्रेम ही है जिसके कारण माता पिता स्वयं अत्यंत कष्ट सहन करके भी अपनी सन्तान को सुख देने का प्रयास करते हैं।

प्रेम अन्तर्मन/आत्मा का विषय है, बुद्धि का नहीं है परन्तु दुर्भाग्य है कि वर्तमान परिवेश में मनुष्य ने प्रेम को बुद्धि का विषय बना लिया है, वासना और आवश्यकता को ही प्रेम का नाम मनुष्य देने लगे हैं । जिस प्रकार हर इन्सान का जीवन जीने तरीका, जीवन के अपने खट्ठे मीठे अनुभव और जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण अलग होने के कारण हम जीवन को परिभाषित नहीं कर सकते ठीक उसी प्रकार प्रेम को भी शब्दों की सीमा में मनुष्य बाँधा नहीं सकता है ।

  प्रेम के लिए कोई भी कारण नहीं होता जिस प्रेम का कारण बताया जा सके, वह प्रेम हो ही नहीं सकता है।

प्रेम किसी के लिए आदत जैसा है, तो किसी के लिए आवश्यकता जैसा। प्रेम किसी के लिए जिम्मेदारी है, तो किसी के लिए वफादारी। किसी का प्रेम लालसा है, तो किसी का वासना। कोई स्वयं की सुविधा देखकर प्रेम करता है, तो कोई आपसी योग्यता देखकर। किसी का प्रेम मोह हैं, तो किसी का स्वार्थ। अड़चन यही है कि किसी का भी प्रेम, 'प्रेम' जैसा नहीं रह गया है। इन सबमें प्रेम की एक झलक मिलती है। सब प्रेम के करीब तो ले जाते हैं, पर 'प्रेम' हो नहीं पाता। ऐसा प्रेम, सम्बन्धो से जुड़कर, शब्दों में ढलकर खण्डित हो जाता है, पर प्रेम हो नहीं पाता। सच तो यह है कि अब मनुष्य सब कुछ करा रहा है, मात्र प्रेम नहीं कर पा रहा है। यही कारण है, हमने प्रेम को अनेक नाम दिया है और असफल हुए हैं। 

प्रेम के साथ क्यों का कोई भी संबंध नहीं है। प्रेम कोई व्यवसाय नहीं है। प्रेम के भीतर 'हेतु' शब्द होता ही नहीं। प्रेम अकारण भाव—दशा है। न कोई शर्त है, न कोई सीमा है। 'क्यों' का पता चल जाए, तो प्रेम का रहस्य ही समाप्त हो गया। प्रेम का कभी भी शास्त्र नहीं बन पाता। प्रेम के गीत हो सकते हैं। 

प्रेम का कोई शास्त्र नहीं, कोई सिद्धांत नहीं।

प्रेम मस्तिष्क की बात नहीं है। 

मस्तिष्क की होती तो क्यों का उत्तर मिल जाता। प्रेम हृदय की बात है। वहाँ क्यों का कभी प्रवेश ही नहीं होता है । क्योंकि, क्यों है मस्तिष्क का प्रश्न; और प्रेम है हृदय का आविर्भाव। इन दोनों का कहीं मिलना नहीं होता। इसलिए जब प्रेम होता है, तो बस होता है— बेबूझ, रहस्यपूर्ण। अज्ञात ही नहीं—अज्ञेय भी । इसीलिए तो किसी ने कहा कि प्रेम परमात्मा है। इस पृथ्वी पर प्रेम एक 

अकेला अनुभव है, जो परमात्मा के संबंध में थोड़ा इंगित करता है। 

ऐसे ही परमात्मा हैं—अकारण, अहैतुक, रहस्यपूर्ण। 

ऐसे ही परमात्मा हैं जिसका कि हम आर—पार न प्राप्त कर सके हैं न प्राप्त‌ कर सकेंगे। प्रेम परमात्मा की पहली झलक है।

प्रेम....पारस है, जिसे छू ले, उसे कुंदन कर दे!!!

प्रेम पूजा है जिसे हो जाएँ, उसे ईश्वर कर दे !!!

प्रेम की मंजिल नहीं, जिसे हो जाएँ उसे मुसाफिर कर दे!!!

प्रेम तपस्या है जिसे हो जाएँ, उसे फकीर कर दे !!!

प्रेम गजब है, जिसे हो जाएँ उसे अजब कर दे...!!!

सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर समय देने के लिए आप सभी देवतुल्य पाठकगण का हृदय से आभार एवं लेखनी और विचारों में भावी सुद्धता एवं सुधार हेतु टिप्पणी/सुझाव की आकांक्षा ।

Sunday, August 2, 2020

परमात्मा से ही हमारा रिश्ता वास्तविक ....

August 02, 2020 0 Comments
               इस धरा पर प्रत्येक व्यक्ति रिश्तों‌ की डोर से बंधा है, ये रिश्ते रक्त के भी हैं और भावनाओं के भी। यदि हम ईमानदारी से अवलोकन करें तो कोई भी रिश्ता पुर्णतया वास्तविक नहीं मिलेगा, प्रत्येक रिश्ते के पीछे कोई न कोई स्वार्थ अवश्य छिपा होगा। केवल उस पिता परमात्मा का हमसे रिश्ता वास्तविक और निःस्वार्थ है। हम सभी अनेक व्यक्तियों से जुड़े हैं लेकिन प्रत्येक व्यक्ति का अपने जीवन के कार्यों की प्राथमिकता और उसकी क्रमबद्धता की तरह ही रिश्तों की भी एक आन्तरिक प्राथमिकता आधारित क्रमबद्ध सूची होती उसी के आधार पर वह व्यवहार करता है। यही सूची व्यक्ति का व्यक्ति के प्रति व्यवहार में अन्तर उत्पन्न करती है। यही सूची प्रत्येक व्यक्ति के प्रति‌ उसके आन्तरिक व्यवहार में परिवर्तन लाती है। इसी सूची के आधार पर व्यक्ति प्यार, दुलार,सम्मान और अपनत्व की मात्रा का निर्धारण करता है। यह आवश्यक नहीं है कि हमारे लिए जो व्यक्ति भावनात्मक रुप से विशिष्ट हो जिसे हम अधिक प्यार और सम्मान देते हों उसके लिए भी हम उतने ही विशिष्ट हों और वह भी हमें उतना ही प्रेम और सम्मान दे।
                 अधिकांशतः जब एक गर्भ से सन्तानों को जन्म देने वाली 'माँ' और अपने खुन पसीने की कमाई से भरण पोषण करने वाले 'पिता' का आकर्षण भी थोड़ा सा ही सही अपने किसी एक सन्तान प्रति अधिक होता है (इसका आशय माता की ममता और पिता के स्नेह पर सन्देह उत्पन्न करना या उनके सम्मान में कमी करना नहीं है।) तो हमारा अन्य लोगों से समानता के व्यवहार का उम्मीद करना ही व्यर्थ है।
                हमारे बीच के परस्पर प्राथमिकता का यह अन्तर और हमारी व्यवहार में समानता की उम्मीद ही हमें दुःखी करती है/रुलाती है।
         यदि हम किसी किसी के लिए कुछ करते हैं, किसी को प्यार, दुलार और सम्मान देते हैं तो उससे कोई उम्मीद न रखें क्यों कि हमारे कर्मों का सही प्रति फल परम् पिता परमेश्वर के अतिरिक्त हमें कोई दे ही नहीं सकता इसलिए हम उसी से उम्मीद करें उसी को हृदय में स्थान दें यही हमारे लिए हितकर होगा।
                   यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम हम इतना करें कि हम प्रत्येक व्यक्ति को उसके द्वारा प्रदान किये गये सम्मान, प्यार और दुलार के आधार पर ही प्यार, दुलार, सम्मान और हृदय में स्थान दें अन्यथा वह हमें हमेशा रुलायेगा या हम खुद रोते रहेंगें।