अभिजीत मिश्र

Welcome to Suvichar Sangrah सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है :- प्रदीप कुमार पाण्डेय. This is the Only Official Website of सुविचार संग्रह     “Always Type www.suvicharsangrah.com . For advertising in this website contact us suvicharsangrah80@gmail.com.”
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Sunday, March 14, 2021

टुटते रिश्तों,परिवार और समाज का जिम्मेदार कौन ??

March 14, 2021 1 Comments







वर्तमान परिवेश में हमारे रिश्ते,परिवार और समाज की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही है । हम, हमारे रिश्ते, हमारा परिवार, हमारा समाज टुटते और बिखरते जा रहे हैं जो बहुत ही चिंता का विषय है लेकिन शायद इस तरफ किसी का ध्यान इधर नहीं सब इस कृत्रिम रुप से चमचमाती दुनिया और भौतिक संसाधनों को एकत्रित करने की होड़ में भागे जा रहे हैं।

           हमने कभी विचार किया कि इसके पीछे कारण क्या है शायद नहीं, इस लेख के माध्यम से सुविचार संग्रह (suvicharsanrah.com) से इसी विषय पर कुछ प्रकाश डालने का प्रयास कर रहा हुँ कितना सच और सार्थक है यह आप देवतुल्य पाठकगण ही बता सकते हैं। लेख थोड़ा लम्बा अवश्य है लेकिन देवतुल्यों से करवद्ध निवेदन है कि पुरा पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

             वर्तमान समय में उपजे इस परिस्थिति का जिम्मेदार कौन है??

       सबसे अधिक तो आधुनिकता का काला ऐनक लगाये यह संस्कार विहीन वर्तमान शिक्षा व्यवस्था। 

          पहले रिश्ते स्थापित करने से पुर्व हमारे पुर्वज परिवार के संस्कार, सामाजिक स्तर और परिवार का वर्तमान और भूतकाल की स्थिति देखते थे लेकिन अब तो परिवार की पृष्ठ भूमि, परिवार और मन की सुन्दरता न देख कर तन की सुन्दरता, धन सम्पदा, सरकारी नौकरी, भौतिक संसाधन आदि देखा जा रहा है।

             संक्षेप में कहुँ तो अब रिश्तों को व्यवसायिक रुप दे दिया गया है।

              आज माता पिता धन अर्जन और अपनी दुनिया में मस्त हैं जिसकी वजह से बच्चे पुर्णतया स्वच्छंद होते जा रहे हैं और माता पिता धीरे धीरे अपनी इच्छानुसार बच्चों का रिश्ता करने की हिम्मत भी खोते जा रहे हैं।

            आज वर पक्ष को अधिक दान दहेज प्राप्त करने के लिए बड़े घर की वधू चाहिए इतना ही नहीं लड़की वालों को भी छोटा और पैसे वाले परिवार के साथ सरकारी नौकरी करने वाला वर चाहिए और लड़का परिवार से दुर नौकरी करता हो तो सोने पे सुहागा जिससे लड़की को काम न करना पड़े । इसी सब के कारण परिवार इतना छोटा होता जा रहा है कि बाबा दादी, ननद देवर आदि तो दुर हैं माता पिता भी बोझ लगने लगे हैं । परिवार का आशय तो केवल और केवल पति पत्नी और बच्चे हो गया गया है लेकिन हम भूल रहे हैं कि हम भी कभी इन रिश्तों के रुप में स्थापित होंगे।

           पहले रिश्ता करते समय माता पिता गर्व से यह बताते थे कि मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष है लेकिन अब तो गर्व के साथ यह बताया जाता है कि हमनें हमारी बेटी से कभी कोई काम नहीं करवाये हैं। वर्तमान समय में तो रिश्ता सोशल साइट्स पर ढुढाँ जाने लगा है जहाँ परिवार की पृष्ठ भूमि का पता ही नहीं चलता बल्कि वहाँ निर्जीव वस्तुओं और जानवरों की तरह बड़ी बड़ी मण्डियाँ सजी हैं लड़के और लड़कियों के ।

               हमारे समज में एक और बहुत बड़ा संक्रमण बहुत तेजी से पाँव फैला रहा है और वह है कि लड़का और लड़की दोनों कमाने वाले चाहिए इसलिए अधिकांश परिवारों में माता पिता की सेवा तो दुर की बात है अहंकार ऐसे टकरा रहे हैं कि भोजन बनाये कौन यह भी समस्या होती जा रही जिसकी वजह से तलाक, पारिवारिक विघटन, और आत्म हत्या की घटनाएं बढती जा रही हैं। हम भुल चुके हैं कि बड़े घर बड़ी गाड़ी  भौतिक संसाधनों के भण्डार के स्थान पर परिवार चलाने के लिए रोटी कपड़ा और मकान के साथ  प्रेम, समर्पण आपसी ताल मेल की आवश्यकता ज्यादा है ।

              पहले हमारे घरों में न कोई भौतिक संसाधन था, न मनोरंजन का साधन और ना ही कार्य सरल करने के संसाधन उपलब्ध थे । मसाला पीसना, आटा तैयार करना कपड़े धुलना सभी कार्य माताएँ बहनें करती थी, यही उनके मनोरंजन के साधन थे । जबकि वर्तमान काल में लगभग हर घर में कार्य सरल करने के लिए मिक्सी,वाशिंग मशीन आदि, मनोरंजन के लिए विभिन्न चैनलों के साथ टी वी, घण्टों बात करने के लिए मोबाईल आदि संसाधन उपलब्ध हैं फिर भी असंतोष व्याप्त है हर परिवार और प्रत्येक सदस्य के अन्दर व्याप्त है ।

            उपयुक्त बातों के साथ दो अन्य कारणों पर विस्तृत नजर डालना चाहूँगा इन दोनों कारणों में पहला है--

 सास द्वारा यह भूल कर की उनकी बेटी भी किसी घर की बेटी बनेगी अपनी बेटी के सामने ही उसका महिमा मण्डन कर उसे श्रेष्ट और बहू को तुच्छ सिद्ध करने का प्रसाय करके परिवार के विघटन की बुनियाद रखी जाती है। 

               दुसरा है बेटी के ससुराल में बेटी के माता पिता द्वारा आवश्यकता से अत्यधिक और अनर्गल हस्तक्षेप करना, मोबाईल की सहज उपलब्धता के कारण बहुत ही बढता जा रहा है।

                आज तो लगभग प्रतिदिन घण्टों बातें होती हैं और बातें भी क्या !! --- आज भोजन क्या बनाई, तुम्हारे, देवर,ननद,सास या ससुर ने तो कुछ नहीं कहा, उनको ऐसा नहीं नही करना/ कहना चाहिए, मैं हुँ हमेशा तुम्हारे साथ किसी से डरना नहीं किसी का सहना नहीं आदि आदि। मेरे विचार से सर्वथा अनुचित है इस तरह की बातें कर बेटी के घर में हस्तक्षेप करना।

               इस बात से मैं इन्कार नहीं करता कि जिस बेटी का लाड प्यार से माता पिता बचपन से पालन पोषण करके बड़ा करते हैं उसके प्रति मोह होना,उसके सुख दुःख की चिन्ता होना स्वाभाविक है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि अब हमारा अधिकार कम हो गया और यह सब जिम्मेदारी बेटी के पति सास ससुर की हो गयी।

            हस्तक्षेप न करने के पीछे भी एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है जिस प्रकार अपनी स्वतन्त्रता के साथ जीना चाहता है किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहता उसी प्रकार हमारे परिवार की भी स्थिति है। जिस प्रकार पिता पुत्र का व्यवहार, पसन्द, विचार शत प्रतिशत एक समान नहीं होते उसी प्रकार दो परिवारों की परम्परा और रहन सहन एक जैसा नहीं हो सकता भिन्नता स्वाभाविक है।

             इन्हीं बातों के साथ रिश्तों, परिवार व समाज को टुटने और बिखरने से बचाने के लिए सबसे एक बात कहना चाहूँगा कि सोच बदलिये 

और यह बदलने वाली सोच मेरे विचार से प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग अलग है जिसका उल्लेख निम्न प्रकार से है---

लड़कियों से कहना चाहता हूँ कि -- प्रथम प्रवेश में महाविद्यालय/विश्वविद्यालय और ससुराल दोनों समान ही हैं बेहतर भविष्य के लिए दोनों जगह थोड़ी कम या ज्यादा तो रैगिंग बरदास्त करना ही पड़ता है। जिस प्रकार प्रथम प्रवेश पर कालेज में जुनियर होते हैं और एक दिन सीनियर की श्रेणी में गिनती होती है उसी प्रकार ससुराल में यदि आज बहु हैं तो कल सास बनेंगीं इसलिये सहनशीलता के साथ परिवार के छोटे बड़े सबका सम्मान करना चाहिए जिसका फल एक दिन अत्यंत मधुर और मीठा प्राप्त होगा।

लड़कों से कहना चाहता हुँ कि --- वह माता पिता की भावना के सम्मान के साथ पत्नी की भावनाओं को भी समझने का प्रयास करें उसके सुख दुःख को समझें, परिवार की परम्पराओं का ज्ञान करावें क्योंकि वह आपके भरोसे ही अपना सब रिश्ता छोड़ नये वातावरण में आयी है।

लड़के लड़कियों से संयुक्त रुप से कहना चाहुँगा कि ---- एक दुसरे का सम्मान करें, बड़ों से नियमित रुप से सलाह और आर्शीवाद लेते रहें, बड़ों के अनुभवों का भरपूर लाभ उठावें, कोई निर्णय लेने से पुर्व पुर्ण गम्भीरता पूर्वक सोच समझ लें, सबके जीवन में उतार चढाव तो लगा रहता है इन सब बातों के साथ शीघ्रतापूर्वक कोई गलत निर्णय लेकर आत्मघाती बनने से बचें।

सासु माता लोगों से कहना चाहता हुँ कि ---- बेटी को कभी बहु नहीं बनाया जा सकता बहु को बेटी अवश्य बनाया जा सकता है।

बेटी के साथ खून का रिश्ता अवश्य है लेकिन बहू दुसरे परिवार से आने के बाद भी नौकरानी नहीं गृह लक्ष्मी है, परिवार/कुल का संचालक है, सास ससुर और उनके बेटे के मध्य आजीवन के लिए एक सेतु बन्ध है इसलिए बहू प्रसन्न तो परिवार प्रसन्न अन्यथा परिणाम का मालिक ईश्वर ।

 लड़की के माता पिता जी लोगों से कहना चाहुँगा कि ---- लड़की के यहाँ महीने में एक दो बार फोन करके कुशल क्षेम अवश्य पुछ लें और जब तक बेटी यह न कहे कि उसके साथ अत्याचार हो रहा है तब तक पूर्णतया सच्चाई जाने बिना अनर्गल हस्तक्षेप करने से बचें। यदि लड़की के माता पिता अपनी सीमा से बाहर जाकर हस्तक्षेप करते हैं परिणामस्वरूप परिवार टुट सकते हैं इसलिए गम्भीरता पूर्वक विचार करने के बाद ही बेटी के ससुराल वालों से व्यवहार करें लेकिन बेटी को यह विश्वास अवश्य दिला कर रखें कि यदि वास्तव में वह अपनी क्षमता व जानकारी के अनुसार अच्छे परिवार और लड़के की तलाश किये हैं लेकिन फिर भी वास्तव में उसके साथ कोई अत्याचार होता है तो उसके लिए उसके पीहर के द्वार सदैव खुले हैं।

इस लेख की अन्तिम कड़ी में

समाज से मात्र इतना निवेदन करना चाहता हूँ कि ----

समाज के लोग एक पहल करें जिससे विवाह उचित आयु में होने के साथ कम खर्चीला हो क्योंकि धनाढ्य लोग लाखों रुपये बेवजह प्रदर्शन में व्यय करते है और इसके चक्कर मध्यम और निम्न वर्ग के लोग पिस कर कर्ज के बोझ से डुब जाते हैं ।

        यह लेख लेखक का निज विचार है । इसका अपवाद और विचार मे त्रुटि सम्भव है। इस लेख का उद्देश्य किसी को भावनात्मक रुप से आहत करना नहीं है।

इस लेख को पुरा पढने और सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर समय देने के लिए समस्त देव तुल्यों का आभार ।

यदि लेख पसन्द आये तो समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन के लिए आर्शीवाद स्वरूप अधिक से अधिक साझा करें।


 

Saturday, February 27, 2021

दहेज प्रथा/अभिशाप जिम्मेदार कौन?

February 27, 2021 0 Comments












कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक तस्वीर खुब दिखाई दे रही है जिसमें एक दुल्हन दुल्हे सहित दहेज से लदे गाड़ी को खिंच रही है, निःसन्देह यह तस्वीर भावुक कर देने वाली है और हमारे समाज में व्याप्त दहेज की भयावहता को प्रदर्शित कर रहा है। सुविचार संग्रह ( suvicharsangrah.com) पर यह लेख इसी पर आधारित है।
       मित्रों भारत में दहेज प्रथा बहुत समय से चला आ रहा है लेकिन समय के साथ इसका रुप और भयावहता सुरसा के मुँह की तरह बढता जा रहा है। वास्तव में पुर्व काल में वधू (कन्या/लड़की) का पिता वर (लड़के/दुल्हे) को अपनी स्वेक्षा से उपहार स्वरूप अपनी खुशी से अपनी क्षमतानुसार धन या वस्तु देता था लेकिन समय के साथ वर पक्ष इसे अधिकार मानने लगा और वधू पक्ष अपनी मजबूरी, जितना अधिक दहेज में वस्तुएँ प्राप्त होती हैं उतना ही उसे प्रदर्शित कर वर पक्ष अपने को गौरवान्वित महसूस करने लगा है दुसरे शब्दों में कहूँ तो दहेज एक स्टेटस सिम्बल बन गया है।
लेकिन इस बढ़ती महंगाई में दहेज के बढ़ते इस चलन का वास्तविक दोषी कौन है?? यह हमें समझना होगा।
         सामान्यतः हम सबके नजर में यही है कि दहेज प्रथा का वास्तविक दोषी वर पक्ष ही है लेकिन मेरे विचार से यह उचित नहीं है, मेरे विचार से  वर पक्ष जितना दोषी/जिम्मेदार है उससे थोड़ा कम ही सही लेकिन दोषी वधू पक्ष भी है। मेरा यह विचार अधिकांश लोगों को गलत लग रहा होगा जो सामान्यतः लगना भी चाहिए लेकिन किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले पुर्व व वर्तमान सामाजिक ढांचा सोच और प्रचलन को समझने की आवश्यकता है ।
             पुर्व काल और आज के परिवेश में बहुत परिवर्तन हो गया है । पहले माता पिता अपनी बच्चियों को गृह कार्य में दक्ष करते थे, संयुक्त परिवार में रहने की और संस्कारिक जीवन व्यतीत करने की शिक्षा देते थे, विवाह खोजते समय परिवार का आधार,सामाजिक स्तर, पारिवारिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक संस्कार देखते थे, वर का बात, व्यवहार और आचरण देखते थे; वर पक्ष के सामने अपनी कन्या का परिचय करवाते समय गर्व के साथ गृह कार्य में दक्षता और निपुणता का गुणगान करते थे लेकिन वर्तमान काल में हो क्या रहा है हमें यह भी देखना नितान्त आवश्यक है, मित्रों आज लगभग प्रत्येक कन्या का पिता ऐसा परिवार ढुढ रहा है जो एकल हो और वर सरकारी नौकरी वाला हो इतना ही नहीं कुछ तो इससे भी आगे बढ़ के खोज रहे हैं कि लड़का अपनी पत्नी को लेकर परिवार से दुर/अपने कार्य स्थल पर लेकर रहे, कन्या का परिचय कराते समय यह बताने में गर्व महसूस कर रहे हैं कि हमारी बच्ची से हम कोई कार्य नहीं करवाते हैं । गृह कार्य में दक्ष बनाना तो दुर संयुक्त परिवार में रहने की शिक्षा ही नहीं दिया जा रहा है। 
          इस दहेज प्रथा को धीरे धीरे समाप्त करने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक कन्या का पिता अपनी सोच बदले; कन्या को आत्म निर्भर बनाया जा, संयुक्त परिवार में रहनें के संस्कार के साथ गृह कार्य में प्रवीण किया जाय इसके अतिरिक्त प्रत्येक कन्या के पिता को सबसे बड़ा परिवर्तन अपनी सोच में यह लाना होगा कि जितना पैसा, सामग्री दहेज के रुप में देने और दिखावे के रुप में तमाम खर्च कर एकल परिवार का सरकारी नौकरी करने वाले वर खरीदने लिए तैयार होता है यदि वही धन या उससे कम धन से ही एक प्रतिष्ठित, सामाजिक, गृहस्थ/कृषक परिवार के सुयोग्य सुशील और सद्गुणी बेरोजगार वर ही सही खोज कर उसे उसी धन से अच्छा स्वरोजगार/व्यवसाय करा दिया जाय तो शायद एक बेरोजगार युवक को अच्छा रोजगार मिलने के साथ दोनों परिवार ही सुखी रह सकते हैं और दहेज के लोभियों/ अपने लड़के का कीमत लगाने वाले लोगों की कीमत भी स्वतः घटने लगेगी ।
           इस दहेज रुपी दानव को मारने के आवश्यकता है मात्र प्रत्येक कन्या के पिता को अपनी सोच बदलने की। जिस दिन से कन्या के पिता अपनी सोच बदलने लगे उसी दिन से इन दहेज लोभियों के लड़कों की कीमत भी स्वतः गिर जायेगी।
          इस लेख का उद्देश्य किसी की भावना को आहत करना नहीं है। यह लेख लेखक का निज विचार है, अपवाद सम्भव है।
सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर समय देने/पुरा लेख पढने के लिए आप सभी पाठकों का बहुत बहुत आभार ।







 

Tuesday, February 23, 2021

माह फरवरी विशेष

February 23, 2021 0 Comments








मित्रों वर्तमान में समय में युवा पीढ़ी का रुझान पाश्चात्य भाषा विशेषतया अंग्रेज़ी की तरफ बढता जा है । अंग्रेज़ी एक स्टेटस सिम्बल बन गया है किसी भी भाषा का ज्ञान प्राप्त करना बुरा नहीं है लेकिन यह पाश्चात्य भाषा के साथ युवाओं में पाश्चात्य सभ्यता भी दिन दुना रात चौगुना की गति से बढ़ती जा रही और यह विलुप्त करती जा रही है हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता को। इसी बढते पाश्चात्य सभ्यता के कारण ही युवा साथी अंग्रेज़ी कैलेण्डर वर्ष के फरवरी माह का महत्ता बढा दिया है।  सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर मैं इसी फरवरी माह पर यह लेख है ।

          किसी भी भाषा या सभ्यता का ज्ञान होना बुरी बात नहीं है अंग्रेज़ी तो विश्व पटल पर संवाद स्थापित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है लेकिन इसका अभिप्राय यह बिल्कुल नहीं है कि हम अपनी भारतीय संस्कृति और सभ्यता का त्याग कर दिया जाय । मैंने क‌ई बार अपने पिछले लेखों में यह उल्लेख किया है कि जिस राष्ट्र की भाषा, संस्कृति और सभ्यता की उपेक्षा उस राष्ट्र के लोग ही करने लगें उस राष्ट्र का पतन स्वाभाविक है। वर्तमान समय में युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग सभी की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम अपने भारतीय संस्कृति, सभ्यता और परम्पराओं को सजा सवांर और सहेज कर आने वाली पीढी को हस्तान्तरित करें अन्यथा हमारी संस्कृति को विलुप्त होने में अब देर नहीं लगेगी क्रय आने वाली पीढ़ी और भी खर्चीली होगी।

         अब हम आते हैं मुख्य विषय फरवरी माह पर- अब फरवरी माह प्रेम के माह के रुप में देखा जाने लगा है। समझ में नहीं आता यह प्रेम एक माह का है या यह माह प्रेम का है ??? जो भी हो हमारी पुरातन भारतीय संस्कृति में तो प्रत्येक रिश्ते में हर दिन, हर पल प्रेम,सौहार्द, समर्पण और सम्मान का होता है तो फिर हम दिन और माह में क्यों बंधते जा रहे हैं?? इस माह में अलग अलग तिथियों को रोज डे, प्रपोज डे, चाकलेट डे, ट्रेडी डे, प्रामिस डे, हग डे, किस डे और वेलेन्टाइन डे के रुप में हमारा युवा वर्ग मना रहा‌ है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो जा रहा कि किस दिन क्या किया जायेगा हमारे युवा वर्ग के पति पत्नी और प्रेमी युगलों द्वारा । यदि हम गौर करें अपने पिछली पीढीयों पर तो देखने को मिलेगा कि पहले के अधिकांश विवाह अभिभावक के मर्जी से होता था और शारीरिक व सौन्दर्य की दृष्टि से बेमेल होते थे फिर भी वे जीवन की अन्तिम यात्रा तक टुटते नहीं थे इसका प्रमुख कारण एक दुसरे के प्रति आत्मीयता, समर्पण, त्याग, सम्मान, समर्पण के साथ आपसी ताल मेल होता था जब कि वर्तमान समय में फरवरी माह के इस दिखावे के साथ प्रेम विवाह बढें हैं और इनमें से अधिकांश असफल हो कर टुट रहे हैं जिसके मूल कारण है आज लोगों का अहंकारी होना जिसमें एक दुसरे की भावनाएं दिखाई नहीं देती और विवाह का आधार सौन्दर्य और देह  प्रेम है।

               हमारे कुछ युवा मित्र कहते मिल जाते हैं कि यह पहला प्यार है मेरा उनसे प्रश्न है साहब शरीरिक रचना,चाल-डाल, आदि देख कर इस आकर्षण को आप पहले प्यार का नाम दे रहे हैं तो वह क्या है जो हमारे माता पिता एक बच्चे के गर्भ में आने पर ही उसे बिना देखे उससे प्यार करने लगते हैं,उसकी सलामती खुशहाली के लिए प्रार्थना करने लगते हैं, माँ नौ महिने कष्ट झेल कर असीम प्रसव वेदना सहन कर हमें अस्तित्व में लाती है।

          उपरोक्त सभी बातों के साथ मैं अपनी युवा पीढ़ी से कुछ प्रश्न पुछता हुँ जब हम स्वयं किसी की बहन बेटी को गुलाब,चाकलेट,ट्रेडी आदि उपहार स्वरूप दे रहे हैं उसका आलिंगन कर रहे हैं, चुम्बन ले रहे हैं तो हम किस नैतिक अधिकार से अपने घर में बहन बेटियों को अनुशासन और चरित्र का पाठ पढ़ाते हैं ।

           हमारा समाज जिस तरह गर्त में जा रहा उसे बचाने के लिए क्या हम स्वयं से स्वयं यह वचन(प्रामिस) नहीं दे सकते कि हम खुद को चरित्रवान बनायेंगें जिससे हमारे समाज की मातृ शक्ति चरित्रहीन होनें से बच सकें , क्या हम खुद से खुद को यह वचन नहीं दे सकते कि हम प्रत्येक नारी का सम्मान करेंगें, क्या हम अपने माता पिता को समय समय पर उपहार नहीं दे सकते, क्या हम माता पिता का आलिंगन कर उनसे नहीं बोल सकते कि हम आपको बहुत प्यार करते हैं माता पिता जी इसके प्रति उत्तर में कुछ युवा कहेंगें हमारे अन्दर इतनी हिम्मत नहीं है उनसे मैं पुछना चाहता हुँ कि जब हमारे पास इतनी हिम्मत है कि दुसरे के बहन बेटी के साथ ऐसा कर सकते हैं तो अपने माता पिता  का आलिंगन क्यों नहीं कर सकते ?? यदि मान भी लिया जाय कि माता पिता को आई लव यु नहीं बोल सकते उनका आलिंगन नहीं कर सकते तो उनका चरण वन्दन करके यह तो कह सकते हैं कि माता पिता जी मैं यह प्रण करता हुँ कि सदैव आपके आर्शीवाद की आकांक्षा रखते हुए आपकी छत्र छाया में आपके साथ रहेंगें, क्या हम अपने आस पास के जरूरतमन्द बच्चों को चॉकलेट, ट्रेडी/खिलौने, उपहार देकर उनके चेहरे पर कुछ पल के लिए मुस्कान ला सकें???

          सब कुछ सम्भव मात्र आवश्यकता है दृढ़ इच्छा शक्ति की, आवश्यकता है बिना विचार किये पाश्चात्य सभ्यता का अनुसरण किये अपने पुरातन संस्कृति, सभ्यता, परम्परा की वैज्ञानिकता को समझ कर उसे अपनाने की, आवश्यकता है अपने समाज और मातृ शक्ति के सम्मान और रक्षार्थ  दृढ़ संकल्पित होने की ।

           यदि मैं संक्षेप में कहुँ तो आवश्यकता है हमारे युवा समाज को अपने दायित्व को समझने, अपने संस्कृति की वैज्ञानिकता को समझने और फिल्मी दुनिया के चकाचौंध भरे दिखावे से प्रभावित होकर पाश्चात्य संस्कृति का अन्धानुकरण से बचने की साथ ही इसके लिए हमारे समाज के पौढ़ और वृद्ध/अनुभवी लोगों को जागरुक होकर युवाओं का  मार्गदर्शन कराने का यथासम्भव प्रयास करने की।

         यह लेख लेखक का व्यक्तिगत विचार हैं।

         सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर समय देने/लेख पढ़ने के लिए कोटि कोटि साधुवाद ।

Tuesday, January 19, 2021

बढ़ती बेरोजगारी जिम्मेदार कौन ??

January 19, 2021 1 Comments

 



भारत वर्ष में बेरोजगारों की संख्या सुरसा के मुँह के तरह बढती जा रही है और इसमॆं देखा जाय तो शिक्षित बेरोजगारों की संख्या बहुत ज्यादा है इसलिए यदि इसे शिक्षित बेरोजगारों की संख्या कहें तो शायद गलत न हो। वह समय अब बहुत दुर नहीं जब हमारे देश में यह बेरोजगारी एक भयावह रुप ले लेगी । 

           बेरोजगारी के लिए दशकों से सरकार को जिम्मेदार बताते हुए कोसा जाता रहा है चाहे सरकार किसी भी दल की हो ।

निश्चित ही यह एक विकट समस्या है लेकिन क्या कभी हमने गम्भीरता से इस विषय पर चिंतन किया है कि वास्तविक जिम्मेदारी है किसकी ??

               प्रथम दृश्यट्या हम मान लेते हैं कि सरकार की जिम्मेदारी है कि वह देश के युवाओं को रोजगार उपलब्ध करावे लेकिन क्या सतप्रतिशत रोजगार सरकार दे सकती है और क्या केवल दोषारोपण से हमारी/युवाओं की जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है ??

      कम से कम मेरे विचार से तो नहीं, मेरे विचार से इस बढती बेरोजगारी के लिए जितना जिम्मेदार हमारी सरकारें हैं उतने ही जिम्मेदार हमारे देश के युवा और उनके अभिभावक भी हैं। मेरा यह कहना शायद हमारे बेरोजगार साथियों और उनके अभिभावकों की भावना को आहत कर दे जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हुँ लेकिन ऐसा कहने के पीछे दो मुख्य कारण हैं जिसमें पहला यह है कि हमारे देश में आम धारणा बनी हुयी है कि सरकारी नौकरी ही रोजगार है तथा दुसरा कि हमारे देश के अधिकांश युवाओं की शिक्षा लक्ष्य विहीन है। इतना ही नहीं बहुतायत छात्र ही नहीं उनके अभिभावक भी इस प्रयास में रहते हैं कि किस विद्यालय से बिना परिश्रम सहजता से अधिक नम्बर प्राप्त किया जा सकता है, यदि इसे सरल शब्दों में कहें तो अधिकांश युवक शिक्षित होने के स्थान पर डिग्रीधारी होने में लगे रहते हैं।

             उपरोक्त लाइनों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि सभी बेरोजगार डिग्रीधारी हैं योग्य नहीं हैं, उनमे हमारे होनहार युवा भी हैं। इन होनहारों में कुछ चंचल हैं क्यों कि मानव मन जितना शक्तिशाली है उतना ही चन्चल भी है जिसकी चंचलता के कारण हमारी समस्त शक्ति बिखरी रहती है जिसके कारण हम सहजता से सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

             मानव में असीम शक्तियाँ वास करती हैं, जब हम एकाग्र चित्त होते हैं तो जिस भी शक्ति के लिए हमारे अन्दर एकाग्रता आती है वह शक्ति हमारे अन्दर सुषुप्ता अवस्था से जागृत अवस्था में परिवर्तित हो जाती है और हम उस शक्ति से ओतप्रोत हो जाते हैं लेकिन जब हम अपने अन्दर एकाग्रता नहीं ला पाते तो ऐसी दशा में हम कोई एक निर्णय ले ही नहीं पाते हैं और हमेशा इधर उधर डोलते रहते हैं, ऐसी दशा में सफलता देवी का दर्शन हमें नहीं हो पाता है। 

               जीवन में हमें सफलता देवी के दर्शन उसी समय हो सकता है जब हम एकाग्रता पर ध्यान देकर एक लक्ष्य को देखें और हमें कुछ दुसरा दिखाई ही न दे ; चारो तरफ बस हमारा लक्ष्य हमारा उद्देश्य ही दिखाई दे।

         इसके बावजूद ऐसा होता है कि हमारे जीवन में, लक्ष्य प्राप्ति में कुछ समस्याएं आती हैं, जो हमें समस्याएं दिखाई देती हैं वह वास्तव में हमारे अन्दर की ही वृत्तियाँ हैं जो हमें सफलता के पथ पर अग्रसर होने से रोकती हैं । यदि हमें लक्ष्य प्राप्त करना है तो  स्वयं पर विश्वास रखते हुए दृढ़तापूर्वक उन विचारों को त्याग देना चाहिए जो हमें पथ से भटका रही हैं।

          संक्षिप्त में कहें तो केवल शिक्षा या नौकरी में ही नहीं बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मन की असीम शक्तियों को केवल और केवल अपने लक्ष्य पर केन्द्रित करके ही सफलता प्राप्त की जा सकती है और हमारा ध्यान भी इस प्रकार केन्द्रित हो जिससे हमें कुछ लक्ष्य के अलावा दिखाई ही न दे, जैसे अर्जुन नें किया जिससे उन्हें केवल मछली की आँख दिखाई दे रहा था।

          हृदय एक बार तब अवश्य दुःखी हो जाता है जब इन सभी तथ्यों के बाद भी हमारे समाज में प्रतिभाएं तुच्छ राजनीति के चक्कर में आरक्षण, जातिवाद, क्षेत्रवाद और भ्रष्टाचार की भेंट चढ जाते हैं ।