अभिजीत मिश्र

Welcome to Suvichar Sangrah सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का परिचय करवाती है :- प्रदीप कुमार पाण्डेय. This is the Only Official Website of सुविचार संग्रह     “Always Type www.suvicharsangrah.com . For advertising in this website contact us suvicharsangrah80@gmail.com.”
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Friday, April 23, 2021

प्रभु राम के जीवन से प्राप्त प्रमुख शिक्षा (रामनवमी विशेष)

April 23, 2021 0 Comments

 


देव तुल्य पाठकगण सुविचार संग्रह (suvicharsangrah.com) पर मैं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी के बारे में अपना विचार प्रस्तुत करने जा रहा हुँ । मेरे विचारों में गलती और विचारों का विरोधाभास सम्भव है।

                सदियों से हम सब रामनवमी भी मनाते हैं और विजया दशमी भी मनाते हैं। यह दोनो पर्व भगवान राम से जुड़े हैं । हम पर्व तो मनाते हैं, राम राज्य की बात भी करते और सुनते हैं लेकिन क्या हम इस राम राज्य की कल्पना को साकार करने के लिए यह विचार करते हैं कि सभी देवों में भगवान राम को ही मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा गया??

क्या हमने कोशिश की भगवान राम के जीवन को पढने समझने और उसे जीवन में उतारने की??  मैं कहुँगा नहीं बिल्कुल नहीं क्योंकि यदि हम जरा सा भी अपने आचरण को उनके अनुरुप बनाने की कोशिश भी करते तो हमारे समाज का स्वरूप ही आज कुछ और होता ।

              सबसे बड़ी विडम्बना हमारे समाज की है कि हम किसी देव, ऋषि, मुनि, महापुरुष का चरण तो पूजते हैं लेकिन आचरण नहीं पुजते/आचरण अपने जीवन में उतारने की कोशिश नहीं करते।

             वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियाँ जब हमारे चारो तरफ डर, संशय, और एक अनिश्चितता का माहौल बनायें हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति खुद को बीच मजधार मॆं फंसा और खुद को अन्दर ही अन्दर टूटा महसूस कर रहा है तो प्रभु राम के जीवन की प्रेरणा से हम एक नयी उर्जा और सकारात्मक शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।

              सुविचार संग्रह ( suvicharsangrah.com ) पर इस लेख के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी के जीवन के कुछ बिन्दुओं/ आचरण पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है जो हमें एक आदर्श व्यक्ति, आदर्श परिवार, आदर्श समाज, आदर्श राष्ट्र के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है।


जीवन -- भगवान राम का जीवन हमेशा उतार चढाव भरा रहा              है । मानव जीवन के प्रति भगवान की सबसे बड़ी और पहली सीख तो यही है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उतार-चढाव, दुःख-सुख लगा रहता है लेकिन यदि हमने आत्मबल और संयम को बनाये रखा तो जीवन में आने वाले बड़े से बड़े चुनौती का सामना हम बड़े ही सरल और सहज ढंग से कर लेंगें। 

      अतः हमें जीवन में अपना आत्मबल और संयम सदैव बनाये रखना चाहिए ।

व्यक्तित्व -- प्रभु राम का व्यक्तित्व बिल्कुल सरल, सहज, शान्त, शीतल और संतुलित रहा । परिस्थितियाँ उनके जीवन पर कभी हबी नहीं हुयीं । यदि हम यह कहें कि उन्होंने परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया तो यह गलत नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में संतुलन कभी नहीं खोया ।

शालीनता -- माता सीता के हरण उनका पता लग जाने के बाद                   लंका पहुँचने में सबसे बड़ी बाधा समुद्र पार करना था, भ्राता लक्ष्मण की इच्छा थी कि अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए समुद्र सुखा दिया जाय लेकिन प्रभु को यह स्वीकार नहीं था, उस समय भी प्रभु राम शालीनता का परिचय देते हुए समुद्र से विनय ही किये क्योंकि वह चाहते थे कि समुद्र की मर्यादा भी बची रहे और समुद्री जीव जन्तुओं को नुकसान भी न पहुँचे और हुआ भी ऐसा ही स्वयं समुद्र ने बीच का विकल्प प्रभु के सामने रखा।

            इससे यह स्पष्ट है कि यदि हम जीवन में शालीनता और संयम बनाये रखें तो हर परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

दृढ़ संकल्प व वचन पालन -- प्रभु राम से हमें सीखना चाहिए                                            कि वह किस प्रकार वचन का सम्मान करना चाहिए और अपने संकल्पों के प्रति कैसे दृढ़ रहना चाहिए । युवा अवस्था में भगवान राम का वन जाना और साधनों के अभाव में वानर भालुओं की छोटी सेना लेकर लंका विजय प्रभु राम के वचन पालन और दृढ़ संकल्प को ही प्रदर्शित करता है जिसका अभाव आज हम सबमें देखा जा सकता है।

छुआ छुत, पुर्वाग्रह और नकारात्मकता से दुर सबका सम्मान -- प्रभु राम का चरित्र हमें बहुत बड़ा सन्देश देता है कि                किसी भी स्थिति में हमें पूर्वाग्रह और नकारात्मकता से ग्रसित नहीं होगा चाहिए ।  वन गमन में माता कैकेयी और मन्थरा की अहम भूमिका थी, शत्रुघ्न जी का व्यवहार कुछ उनके प्रति खराब हुए लेकिन प्रभु रामचन्द्र जी ने उनको भी समझाया, अयोध्या आने पर सर्वप्रथम कैकेयी के कक्ष में गये, माता सबरी के जुठे बेर खाये और तमिल भाषा में लिखत एक उल्लेख मिलता है अपने राजा बनने अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रुप में उन्होंने केवट राज निषाद को आमन्त्रित किया। भगवान राम ने कभी नकारात्मक भावना, छल-कपट, दंभ को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया और अपने साथ के लोगों का मार्ग दर्शन करते रहे लेकिन वर्तमान समय में राम राज्य की बात करने वाले लोग भी पूर्वाग्रह, नकारात्मकता, छल-कपट और दंभ के शिकार मिलेंगे।

          शास्त्रों इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि वही व्यक्ति प्रभु राम का कृपा पात्र वही बन सकता है जो छल-कपट, राग, द्वेष, क्रोध से दुर होगा चाहे वह स्त्री, पुरुष, नपुसंक कोई भी हो ।

भाषा एवं दृष्टिकोण -- प्रभु राम की भाषा सदैव मधुर और                                      दृष्टिकोण विस्तृत रहा परिस्थिति चाहे जो रही हो और सामने कोई भी रहा है जिसका दो बड़े उदाहरण हैं उनके वन गमन का कारण बनी माता कैकेयी के प्रति उनकी भाषा, उदारता और सम्मान तथा शिव धनुष टूटने पर भगवान परशुराम का क्रोध में बोलने पर भी उनके प्रति प्रभु का व्यवहार । प्रभु सबकी सुन लेते और बड़ी ही मधुर मुस्कान के साथ सरलता और सहजता से समझा कर उसका क्रोध शान्त कर देते और गलतफहमी भी दुर कर देते। प्रभु राम का दृष्टिकोण इतना विस्तृत था कि उसको शब्द दे पान कम से कम मेरे वश की बात नहीं है मैं बस इतना कह सकता हुँ कि वह समस्त जीव से प्रेम करते थे और इसका सन्देश देते थे लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि उनको मानने वाले सनातनी हिन्दू समाज में ही कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं है सुनाने को सब तैयार बैठे हैं बस अवसर मिलना चाहिए, रही दृष्टिकोण की बात तो समस्त जीव और मानव जाति की छोडिए साहब आज के इन्सान का दृष्टिकोण इतना संकुचित हो गया है कि संयुक्त परिवार छोडिए माता पिता भी आज सबको बोझ लगने लगे हैं।

न्याय, नियम और संयम -- प्रभु ‌सदैव खुद को संयम और                                            नियम के साथ न्याय के लिए समर्पित रखा । न्याय के लिए भगवान राम ने न जाने कितने ही त्याग किये । संयम, न्याय और नियम का पालन करने और इसके लिए त्याग करने का उनसा कोई अन्य उदाहरण शायद ही कोई मिले । बड़ी विडम्बना है साहब हमारे समाज की जिसे हम अपना आदर्श कहते हैं, जिनके हम भक्त बनते हैं उन्हीं के आचरण को हम अपने जीवन में उतारने की कोशिश नहीं करते हैं । नियम और कानून से रहना, न्याय की बात करना यह सब तो हमारे समाज में दिवा स्वप्न सा लगता है । आज तो नियम और कानून तोड़ना बच्चों के खिलौने तोड़ने सा हो गया है और रही बात न्याय के लिए त्याग करने की तो आज त्याग कौन करे न्याय कौन दिलाये   ?? आज तो दुसरों के अधिकारों का हनन करने में लोग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं। 

शत्रुओं से भी करें ज्ञानार्जन -- भगवान राम के चरित्र से हमें                                               एक बहुत बड़ी सीख मिलती है कि ज्ञान जहाँ से जिससे प्राप्त हो उससे मर्यादित तरीके से प्राप्त करें चाहे वह हमारा पराजित शत्रु ही क्यों न हो। इसका उदाहरण उस प्रसंग से मिलता है जब रावण को युद्ध में पराजित करने के बाद प्रभु अपने अनुज लक्ष्मण से कहते हैं कि जाओ और रावण से शिक्षा ग्रहण करो रावण भले ही हमारा शत्रु था लेकिन वह महान शिव भक्त, प्रकाण्ड विद्वान, माता सरस्वती का कृपा पात्र और शिव ताण्डव का रच‌यिता है। 

रिश्तों की मर्यादा का निर्वहन --  प्रभु राम के जीवन से जो                                                 सबसे बड़ी सीख हमें लेनी चाहिए वह है रिश्तों की मर्यादा का सम्मान करना उनका निर्वहन करना क्योंकि आज आये दिन रिश्तों की मर्यादा तार-तार हो रही है । प्रत्येक रिश्ते की मर्यादा रखना उसका निर्वहन करना भगवान राम के जीवन चरित्र का एक अद्भुत और अद्वितीय गुण था । पुत्र, भाई, पति, मित्र, राजा प्रत्येक रिश्ते की मर्यादा का पालन भगवान राम ने की जिसके कारण वह मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये।

               मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी का जीवन और चरित्र अद्भुत और अद्वितीय था। वह युगों युगों तक आम जनमानस में विराजमान रहेगा। एक आदर्श समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यकता मात्र है आम जनमास द्वारा उसे अपने चरित्र में उतारने की ।

                भगवान राम के चरित्र का वर्णन मुझ जैसा अल्प ज्ञानी कर ही नहीं सकता सुविचार संग्रह ( suvicharsangrah.com ) पर मेरा एक छोटा सा प्रयास है अपने अल्प ज्ञान के आधार पर उनके चरित्र के कुछ प्रमुख बिन्दुओं को आप देवतुल्य पाठकों के बीच रखने की इसमें मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुयी यह आप ही बता सकते हैं।

           सुविचार संग्रह ( suvicharsangrah.com ) पर समय देने/पुरा लेख पढ़ने के लिए आप सभी देव तुल्य पाठकों का हृदय से आभार प्रकट करने के साथ सुविचार संग्रह ( suvicharsangrah.com ) आप सभी से निवेदन करता है कि परिवार, समाज और राष्ट्र के एक आदर्श सदस्य की भुमिका का निर्वहन करते हुए कोरोना से बचाव के दिशा निर्देशों का पालन करें और दुसरों को भी प्रेरित करें।

Saturday, October 17, 2020

शारदीय नवरात्रि २०२० विशेष

October 17, 2020 0 Comments

हमारे भारतीय युवा भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्परा छोड कर पाश्चात्य सभ्यता की तरफ भागे जा रहे हैं,

वर्तमान परिवेश में नारी सशक्तिकरण की बात की जा रही है जब कि हमारी सनातन परम्परा में नवरात्रि एक ऐसा पर्व जो हमारी संस्कृति में महिलाओं के गरिमामय स्थान को दर्शाता है।

नारी असीम ऊर्जा का श्रोत है, जिसके बिना श्रृष्टि की संरचना, पोषण, रक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती. नवरात्र में हम इसी नारी शक्ति को पूजते हैं. भारतीय दर्शन ने मां दुर्गा के माध्यम से नारी-शक्ति को महत्व दिया है। वैसे तो मातृ शक्ति का आर्शीवाद हमें हमेशा प्राप्त होता है लेकिन  

पावन पर्व नवरात्र में माता दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर असिम रुप से बरसती है।

 नवरात्र पूजा पर्व वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र माह में, दूसरा आश्विन माह में।

           आश्विन माह की नवरात्र में रामलीला आदि सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान होते हैं जिससे प्रत्येक सनातनी प्रत्येक इंसान एक नए उत्साह और उमंग से भरा होता है।

        दुर्गा को शक्ति की देवी कहा गया है। उनकी पूजा-अर्चना का अपना महत्व है। भक्त 9 दिनों तक मां की शरण में रहते हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत धारण करते हैं और दशहरा के त्योहार के साथ ही व्रत समाप्त हो जाता है।

          नवरात्रके नौ दिनों में स्वयं के बुरे विचार, क्रोध, ईष्या, लोभ जैसे बुरे गुणों पर नियंत्रण किया जाता है।

           मलमास/अधिमास समाप्ति के साथ शारदीय नवरात्रि का‌ पर्व कर्म काण्डी विद्वानों के अनुसार १७/१०/२० से प्रारम्भ हो कर एक दिन की हानि के साथ दशहरा/विजयादशमी २५ अक्टूबर को विजया दशमी/दशहरा के‌ साथ समाप्त हो रहा है, नव रात्रि शनिवार से प्रारम्भ होने के कारण माँ अश्व पर सवार हो कर धरती‌ पर आ रही हैं। 

         नवरात्रि पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है भक्तगण प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के साथ नौ दिनों तक मां दुर्गा जी की पूजा आराधना करते हैं।

          इन नौ दिनों में माता के नौ रुपों की उपासना की जाती है --

प्रथम माँ शैलपुत्री --  मां शैलपुत्री की हिमालय राज की पुत्री हैं माता नंदी की सवारी करती हैं इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का फूल है। 

द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी-- माता ब्रह्मचारिणी मां दुर्गा का दूसरा रूप हैं।माँ श्वेत वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके एक हाथ में कमण्डल और दूसरे हाथ में जपमाला है माता का स्वरूप अत्यंत तेज और ज्योतिर्मय है ।

तृतीय  मां चंद्रघंटा -- नवरात्र के तीसरे दिन माता चंद्रघण्टा की पूजा की जाती है और  माता के सर पर‌ आधा चन्द्रमा सुशोभित है। 

चतुर्थ  मां कुष्मांडा -- चौथे दिन माता कुष्माडा की आराधना होती है, माता कुष्माण्डा शेर की सवारी करती हैं और उनकी आठ भुजाएं हैं।

पंचम  मां स्कंदमाता -- स्कन्द माता की चार भुजाएं हैं माता अपने पुत्र को लेकर शेर की सवारी करती हैं।

षष्ठम्  मां कात्यायनी -- मां कात्यायिनी दुर्गा जी का उग्र रूप है और नवरात्रि के छठे दिन मां के इस रूप को पूजा होती है मां कात्यायिनी साहस का प्रतीक हैं वे शेर पर सवार होती हैं और उनकी चार भुजाएं हैं।

सप्तम् मां कालरात्रि -- नवरात्र के सातवें दिन मां के उग्र रूप मां कालरात्रि की आराधना होती है।

अष्टम  मां महागौरी -- नवरात्रि के आठवें दिन माता महागौरी की पुजा होती है माता का यह रूप शांति और ज्ञान की देवी का प्रतीक है।

नवम्  मां सिद्धिदात्री -- नवरात्रि के अन्तिम दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना होती है ऐसा कहा जाता है। मां सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनकी चार भुजाएं हैं।


 

Sunday, September 6, 2020

पितृ पक्ष विशेष

September 06, 2020 0 Comments


भाद्रपद/आश्विन कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष के नाम से जाना जाता है।हमारे पितर लोग देवों से भिन्न् सामान्य मनुष्य से उच्च श्रेणी में आते हैं। पितृ पक्ष/श्राद्ध पक्ष में श्रद्धा द्वारा अपने पितरों को प्रसन्न किया जाता है। इसमें लोग गौ लोक वासी आत्माओं की तृप्ति व उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ तर्पण करते हैं। यह भी किंवदंती है कि इस पक्ष में यमराज जी मृत आत्माओं को भाव पूर्वक तर्पण स्वीकार करने के लिए मुक्त कर देते हैं। पूर्व काल से ही सनातन धर्म के हर वर्ग द्वारा‌ अपने अपने परम्परागत ढंग से पुर्वजों के नाम से  पूजा, दान आदि किया जाता रहा है इसके साथ ही जरुरतमंदों की सहायता की भी प्रथा है।

           आज आधुनिकता का चश्मा पहने लोग श्राद्ध को पाखण्ड कहने लगे हैं। श्राद्ध कर्म के साथ ही साथ सनातन धर्म के धार्मिक कर्मकांड भी अपना पहचान खोते जा रहे हैं। इसके जिम्मेदार हिन्दू समाज के वो अगुवा वर्ग भी हैं जो यह कर्मकाण्ड करने में अक्षम व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत कर देते थे, जिससे लोग कर्मकाण्डों को पाखण्ड और व्यक्तिगत स्वार्थ की संज्ञा देने लगे । आज का युवा वर्ग श्राद्ध कर्म के साथ ही अन्य धार्मिक को न मानता है न इसके बारे में जानना चाहता है क्योंकि युवाओं के साथ ही कुछ वर्ग इसे ब्राह्मणों द्वारा बनाया गया आडम्बर और धनोपार्जन का माध्यम मानते हैं।

            श्राद्ध कर्म किसी ब्राह्मण के लिए नहीं बल्कि अपने पूर्वजों की तृप्ति के लिए, उनसे आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए, अपने परिवार और कुल की उन्नति के लिए किया जाना चाहिए ।

              सब कर्म काण्ड एक तरफ और जीते जी अपने माता पिता और बुजुर्गों की सेवा एक तरफ है।

             हमें सनातन धर्म के कर्मकाण्डों, परम्पराओं का निर्वहन तो करना ही चाहिए लेकिन इससे आवश्यक है जीते जी अपने माता पिता और परिवार के बुजुर्गों की सेवा करना, उनको खुश रखना यथा सामर्थ्य उनको इच्छानुसार भोजन प्राप्त करवाना क्योंकि कुछ लोग द्वारा तो समाज में अपनी पहचान प्रतिष्ठा और बडकपन दिखाने के लिए भी भोज आदि का आयोजन किया जाता है।

 

Wednesday, July 15, 2020

श्रावण/सावन माह विशेष

July 15, 2020 1 Comments
  
(प्रदीप कुमार पाण्डेय)
श्रावण/सावन मास विशेष
श्रावण मास का महात्मय
श्रावण अथवा सावन हिंदु पंचांग के अनुसार वर्ष का पाँचवा महीना ईस्वी कलेंडर के जुलाई या अगस्त माह में पड़ता है। इसे 'पावस ऋतु' भी कहा जाता है, । इस माह में अनेक महत्त्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं, जिसमें 'हरियाली तीज', 'रक्षाबन्धन', 'नागपंचमी' आदि प्रमुख हैं। 'श्रावण पूर्णिमा' को दक्षिण भारत में 'नारियली पूर्णिमा' व 'अवनी अवित्तम', मध्य भारत में 'कजरी पूनम', उत्तर भारत में 'रक्षाबंधन' और गुजरात में 'पवित्रोपना' के रूप में मनाया जाता है। 'श्रावण' यानी सावन माह में भगवान शिव की अराधना का विशेष महत्त्व है। इस माह में पड़ने वाले सोमवार "सावन के सोमवार" कहे जाते हैं, जिनमें स्त्रियाँ तथा विशेषतौर से कुंवारी युवतियाँ भगवान शिव के निमित्त व्रत आदि रखती हैं।इस वर्ष श्रावण मास 0६ जुलाई से 0३ अगस्त तक रहेगा।

महादेव को प्रिय सावन
सावन माह के बारे में एक पौराणिक कथा है कि- "जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो भगवान भोलेनाथ ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और शिव को प्रसन्न कर उनसे विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह विशेष हो गया।

       इसके अतिरिक्त एक अन्य कथा के अनुसार, मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।
         भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।
पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम 'नीलकंठ महादेव' पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 'शिवपुराण' में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है।
      शास्त्रों में वर्णित है कि सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए ये समय भक्तों, साधु-संतों सभी के लिए अमूल्य होता है। यह चार महीनों में होने वाला एक वैदिक यज्ञ है, जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है, जिसे 'चौमासा' भी कहा जाता है; तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।
 शिव की पूजा
सावन मास में भगवान शंकर की पूजा उनके परिवार के सदस्यों संग करनी चाहिए। इस माह में भगवान शिव के 'रुद्राभिषेक' का विशेष महत्त्व है। इसलिए इस मास में प्रत्येक दिन 'रुद्राभिषेक' किया जा सकता है, जबकि अन्य माह में शिववास का मुहूर्त देखना पड़ता है।
(विद्वानों में अलग अलग विचार हो सकता है।)
भगवान शिव के रुद्राभिषेक में जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी, गंगाजल तथा गन्ने के रस आदि से स्नान कराया जाता है। बेलपत्र, शमीपत्र, कुशा तथा दूब आदि से शिवजी को प्रसन्न करते हैं। भांग, धतूरा तथा श्रीफल भोलेनाथ को भोग के रूप में चढा़या जाता है।
   शिवलिंग पर बेलपत्र तथा शमीपत्र चढा़ने का वर्णन पुराणों में भी किया गया है। बेलपत्र भोलेनाथ को प्रसन्न करने के शिवलिंग पर चढा़या जाता है। कहा जाता है कि 'आक' का एक फूल शिवलिंग पर चढ़ाने से सोने के दान के बराबर फल मिलता है। हज़ार आक के फूलों की अपेक्षा एक कनेर का फूल, हज़ार कनेर के फूलों को चढ़ाने की अपेक्षा एक बिल्व पत्र से दान का पुण्य मिल जाता है। हज़ार बिल्वपत्रों के बराबर एक द्रोण या गूमा फूल फलदायी होते हैं। हज़ार गूमा के बराबर एक चिचिड़ा, हज़ार चिचिड़ा के बराबर एक कुश का फूल, हज़ार कुश फूलों के बराबर एक शमी का पत्ता, हज़ार शमी के पत्तों के बराकर एक नीलकमल, हज़ार नीलकमल से ज्यादा एक धतूरा और हज़ार धतूरों से भी ज्यादा एक शमी का फूल शुभ और पुण्य देने वाला होता है।
बेलपत्र
भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल तरीका उन्हें 'बेलपत्र' अर्पित करना है। बेलपत्र के पीछे भी एक पौराणिक कथा का महत्त्व है। इस कथा के अनुसार- "भील नाम का एक डाकू था। यह डाकू अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए लोगों को लूटता था। एक बार सावन माह में यह डाकू राहगीरों को लूटने के उद्देश्य से जंगल में गया और एक वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया। एक दिन-रात पूरा बीत जाने पर भी उसे कोई शिकार नहीं मिला। जिस पेड़ पर वह डाकू छिपा था, वह बेल का पेड़ था। रात-दिन पूरा बीतने पर वह परेशान होकर बेल के पत्ते तोड़कर नीचे फेंकने लगा। उसी पेड़ के नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। जो पत्ते वह डाकू तोडकर नीचे फेंख रहा था, वह अनजाने में शिवलिंग पर ही गिर रहे थे। लगातार बेल के पत्ते शिवलिंग पर गिरने से भगवान शिव प्रसन्न हुए और अचानक डाकू के सामने प्रकट हो गए और डाकू को वरदान माँगने को कहा। उस दिन से बिल्व-पत्र का महत्ता और बढ़ गया।
सावन सोमवार का महत्त्व
     श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शिव के निमित्त व्रत किए जाते हैं। इस मास में शिव जी की पूजा का विशेष विधान हैं। कुछ भक्त तो पूरे मास ही भगवान शिव की पूजा-आराधना और व्रत करते हैं। अधिकांश व्यक्ति केवल श्रावण मास में पड़ने वाले सोमवार का ही व्रत करते हैं। श्रावण मास के सोमवारों में शिव के व्रतों, पूजा और शिव जी की आरती का विशेष महत्त्व है। शिव के ये व्रत शुभदायी और फलदायी होते हैं। इन व्रतों को करने वाले सभी भक्तों से भगवान शिव बहुत प्रसन्न होते हैं। यह व्रत भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए किये जाते हैं। व्रत में भगवान शिव का पूजन करके एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान कर 'शिव पंचाक्षर मन्त्र' का जप करते हुए पूजन करना चाहिए।
     सावन के महीने में सोमवार महत्वपूर्ण होता है। सोमवार का अंक २ होता है, जो चन्द्रमा का प्रतिनिधित्व करता है। चन्द्रमा मन का संकेतक है और वह भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान है। 'चंद्रमा मनसो जात:' यानी 'चंद्रमा मन का मालिक है' और उसके नियंत्रण और नियमण में उसका अहम योगदान है। यानी भगवान शंकर मस्तक पर चंद्रमा को नियंत्रित कर उक्त साधक या भक्त के मन को एकाग्रचित कर उसे अविद्या रूपी माया के मोहपाश से मुक्त कर देते हैं। भगवान शंकर की कृपा से भक्त त्रिगुणातीत भाव को प्राप्त करता है और यही उसके जन्म-मरण से मुक्ति का मुख्य आधार सिद्ध होता है।

काँवर
    ऐसी मान्यता है कि भारत की पवित्र नदियों के जल से अभिषेक किए जाने से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं। 'काँवर' संस्कृत भाषा के शब्द 'कांवांरथी' से बना है। यह एक प्रकार की बहंगी है, जो बाँस की फट्टी से बनाई जाती है। 'काँवर' तब बनती है, जब फूल-माला, घंटी और घुंघरू से सजे दोनों किनारों पर वैदिक अनुष्ठान के साथ गंगाजल का भार पिटारियों में रखा जाता है। धूप-दीप की खुशबू, मुख में 'बोल बम' का नारा, मन में 'बाबा एक सहारा।' माना जाता है कि पहला 'काँवरिया' रावण था। श्रीराम ने भी भगवान शिव को कांवर चढ़ाई थी।
हरियाली तीज
      सावन का महीना प्रेम और उत्साह का महीना माना जाता है। इस महीने में नई-नवेली दुल्हन अपने मायके जाकर झूला झूलती हैं और सखियों से अपने पिया और उनके प्रेम की बातें करती है। प्रेम के धागे को मजबूत करने के लिए इस महीने में कई त्योहार मनाये जाते हैं। इन्हीं में से एक त्योहार है- 'हरियाली तीज'। यह त्योहार हर साल श्रावण माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस त्योहार के विषय में मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या की थी।
       इससे प्रसन्न होकर शिव ने 'हरियाली तीज' के दिन ही पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस त्योहार के विषय में यह मान्यता भी है कि इससे सुहाग की उम्र लंबी होती है।
       कुंवारी कन्याओं को इस व्रत से मनचाहा जीवन साथी मिलता है। हरियाली तीज में हरी चूड़ियां, हरा वस्त्र और मेंहदी का विशेष महत्व है। मेंहदी सुहाग का प्रतीक चिन्ह माना जाता है। इसलिए महिलाएं सुहाग पर्व में मेंहदी जरूर लगाती हैं। इसकी शीतल तासीर प्रेम और उमंग को संतुलन प्रदान करने का भी काम करती है। माना जाता है कि मेंहदी बुरी भावना को नियंत्रित करती है। हरियाली तीज का नियम है कि क्रोध को मन में नहीं आने दें। मेंहदी का औषधीय गुण इसमें महिलाओं की मदद करता है। सावन में पड़ने वाली फुहारों से प्रकृति में हरियाली छा जाती है। सुहागन स्त्रियां प्रकृति की इसी हरियाली को अपने ऊपर समेट लेती हैं। इस मौके पर नई-नवेली दुल्हन को सास उपहार भेजकर आशीर्वाद देती है। कुल मिलाकर इस त्योहार का आशय यह है कि सावन की फुहारों की तरह सुहागनें प्रेम की फुहारों से अपने परिवार को खुशहाली प्रदान करेंगी और वंश को आगे बढ़ाएँगी।
वर्षा का मौसम
      सावन के महीने में सबसे अधिक बारिश होती है, जो शिव के गर्म शरीर को ठंडक प्रदान करती है। भगवान शंकर ने स्वयं सनतकुमारों को सावन महीने की महिमा बताई है कि मेरे तीनों नेत्रों में सूर्य दाहिने, बांये चन्द्रमा और अग्नि मध्य नेत्र है। जब सूर्य कर्क राशि में गोचर करता है, तब सावन महीने की शुरुआत होती है। सूर्य गर्म है, जो ऊष्मा देता है, जबकि चंद्रमा ठंडा है, जो शीतलता प्रदान करता है। इसलिए सूर्य के कर्क राशि में आने से झमाझम बारिस होती है, जिससे लोक कल्याण के लिए विष को पीने वाले भोलेनाथ को ठंडक व सुकून मिलता है। इसलिए शिव का सावन से इतना गहरा लगाव है।
सावन और साधना
     सावन और साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है, जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है, तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है। उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। अर्थात मन से ही मुक्ति है और मन ही बंधन का कारण है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ़ कर रखा है, इसीलिए साधक की साधना बिना किसी बाधा के पूर्ण होती है।